Khaichatani

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पुस्तक:खैंचाताणि (कविता संग्रह) कवि: वीरेन्द्र जुयाल ‘उपिरि’ प्रकाशक: रावत डिजिटल समीक्षक: आशीष सुन्दरियाल जनसामान्य का मनै वाणी च “खैंचाताणि” एक सामान्य व्यक्ति को जीवन – गाणि, स्याणी अर वूंतै पुर्याणा खुणी ‘खैंचाताणि’ चुलै बकै कुछ भि नी छ। आमआदमी का ये ही मनोविज्ञान तै युवा कवि श्री वीरेंद्र जुयाल ‘उपिरि’ जीन् अपणा रचनाकर्म को आधार बणै अर ये ही रचनाकर्म को सुफल च कि ये युवा कवि की पैली पोथी ‘खैंचाताणि’ गढ़वळि बोली-भाषा का साहित्यप्रेमियों का हाथ मा छ। 120 पृष्ठों की यीं पोथी मा बनि बनिकि 80 रचना छन। यूं रचनाओं मा- अपणि जन्मभूमि धर्म्याळी धर्ति कु ध्यान च, जन्म देण वळि माँ कु मान च, रीता कूड़ा रड़दा भ्याळ छन, वयवस्था की विसंगतियों पर बड़ा बड़ा सवाल छन, हंकार फिटकार नरसिंग भैरों हीत भि छन त हौंस-रौंस माया-प्रीत का गीत भि छन, चुंगुंनि देंदा छ्वटा-छ्वटा छिटगा छन, हास्य-ब्यंग का बड़ा बड़ा बिठगा छन। उन्त वीरेन्द्र जुयाल यीं पोथी का लिख्वार छन पर पोथी पैढ़ि लगद कि ये हम्हरा मन का उदगार छन। पलायन पहाड़ की सबसे बड़ी समस्या छ। पहाड़ मा अपणू बचपन बिताण वळा कवि का हृदय को यांसे प्रभावित हूणो स्वाभाविक छ। पर वीरेन्द्र जुयाल पलायन का वे कारण का तरफ ध्यान आकृष्ट कर्ना छन जो सामान्य तौर फर आज की कविताओं मा नि दिखेंदो। लोग सुविधाओं का अभाव तै पलायन को कारण मानदन पर जुयाल जी हम्हरि देखादेखी याने ‘सिकासैरि’ की प्रवृत्ति तै पलायन को कारण बताणा छन। जनकि वो अपणि रचना ‘सिकासैर’ मा लिखदन कि: अब म्यारा मुलुक न क्वी पौंणू न क्वी बसेर छैंदा कूड़्यूं का मवसा भैर द्यखदै-द्यखदा गौं का गौं खलेगीं कर्दा-कर्दा सिकासैर जिंदगी की कसमाकस मा रिश्तौं की खैंचाताणि आम बात छ अर फिर सासु-ब्वारी तकरार त दुन्या जणद। अपणि रचना ‘घंघतोळ भारि’ मा जुयाल जी यीं तकरार तैं बड़ी सादगी का दगड़ दिखाणा छन अर लिखणा छन कि: एक ब्वे एक ज्वे एक हैंसी हैंकी र् वे नि बणदि द्वियूं मा झणि इन क्य ह्वे
भलै वीरेन्द्र जुयाल जी की उमर अबि भौत कम छ पर जीवन का वूंका अनुभव बड़ा तगड़ा छन। वूंकी जीवन का प्रति जो समज छ वा बड़ी ग्हैरी छ। तबि त वो लिखणा छन कि: हे! ज्वनि तु भिंड्या चखळ-पखळ ना कैर आणु वळु च बुढ़ापा रुक जा जरा द्वी दिन ठैर उन्त हर जगा कांडा लग्यां छन पर उत्तराखण्ड का परिप्रेक्ष्य मा नेताओं की कुछ जादा हि पछिंडि हुयीं च तबि त अलग राज्य बणणा बाद भि उत्तराखण्ड का गैराल हुयां छन। यो दर्द जुयाल जी की कविताओं मा साफ दिखेंद जब वो लिखदन कि: मनखी गगनगोळ गौं मा सुंगर बंदुरु की डार हूंदी-खांदि मौ छै भुला हर्चि गौं-गुठ्यार खरिड़ि डांडि कांठि तिबरि-डंड्यळि ह्वेगे खंद्वार विकास तिमलौ फूल ह्वेगे भुला यूं नेतौं क भ्वार वीरेन्द्र जुयाल ‘उपिरि’ हास्य-ब्यंग का सल्ली कवि छन। कखिम वो कुतगळि लगांदिन् त कबि वो समाज की विसंगतियों पर करड़ि कटाग मारदिन्। एक इनी हि अपणि हास्य-ब्यंग की रचना ‘क्य अर किलै’ मा वो ब्वना छन कि: उक्टेणू खुणि सगोर ब्वना छन संटुलों खुणि चकोर ब्वना छन इनी एक हैंकी रचना मा आज जो घर गौं की स्थिति च वेको चित्र जुयाल जी हम्हरि समिणि रखणा छन जैमा निराशा भि च त आक्रोश भि च। रुण भि औणी च त हैंसी भि। यूं पंक्ति देखा जरा: दिन द्वफरी म्यारा मुलुक प्वड़ीं चा रात सुन्नपट चुकापट गौं ह्वेगिन् जन भुतुं का घाट धुरपळि मा बांदर डिस्को कना छन चौक खल्याण मा स्याळ कना छन ऐड़ाट प्रेम श्रृंगार की रचनाओं मा भि वीरेन्द्र जुयाल कुछ अलग तरह का बिम्ब अर प्रतीकों को प्रयोग करदन जनकि: मि सिकैतूं क बुज्या छौं वा फल-फुलों की डाळ चा मि गुस्सा कु मण्डाण छौं वा चांदना अग्याळ चा मि आग कु अग्यलु छौं वा ठंडि हवा अंग्वाळ चा मि खरड़ पटृ डांडो छौं वा मसूरी नैनीताल चा पारम्परिक विषयों का दगड़ै दगड़ बीरेंद्र जुयाल उपिरि जीन् कुछ नया प्रयोग भि करिन्। जनकि महाकवि कन्हैयालाल डंडरियाल जी की ‘सत्यनारायण कथा’ की तरह संस्कृत-गढ़वळि की मिश्रित रचना ‘लमड़दौं झणि’ तै देख ल्या: कस्तूरी तिलकं ललाट पटले ल्यो रे भुला कचमोळि जरा गिलासुंद एक तुराक धैरिले वक्षस्थले कौस्तुभम् छुछा टक्क जमीं चा टिंचिरि फर ल्या रे चम्म चम्म भिजौ गौळि अखण्यौ रम्म रम्म उन्नी नेपाल का लोग जो मजदूरी कनौ ऐन् अर अब यखा समाज मा मट्ठू मट्ठू कै रळैणा छन वूं फर भि जुयाल जीन् नेपाली तर्ज मा एक सुन्दर कविता ‘माटा फान छौ’ लेखी जो मनोरंजक ढंग से वूं की दिनचर्या तै दर्शांद। इन्नी जापानी विधा ‘हाइकू’ की तर्ज पर लिखीं रचना छन। अर पोथी का आखिर मा द्वी सुन्दर बालोपयोगी कविता ‘स्वर’ व ‘वन टू’ भि वीरेन्द्र जुयाल उपिरि जी की पैली पोथी “खैंचाताणि” मा पढ़णा खुणि मिलदन। कुल मिलैकि, वीरेन्द्र जुयाल उपिरि जीन् अपणि यीं पैली पोथी तै अपणि माटी का हर रंग मा रंग्याणै कोशिश करे जैमा मन का भाव अर जीवन का अभाव- द्वी चीजों को प्रभाव दिखेंद। हर धाणि मा ‘खैंचाताणि’ नजर आंद। -आशीष सुन्दरियाल

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