Fagnai Fikwali

Fagnai Fikwali

मयळ्दु मनै मंथा मा खिल्दु बाळो बसन्त छ ‘फाग्णै- फिक्वळि’ – आशीष सुन्दरियाल

साहित्य मूलतः मन अर मन का भावों को विषय छ। ब्वलीं बात जिकुड़ि मा छप्प बैठ जा बस्स! लिखण वळै भि अर पढ़ण वलै भि- बाकी बात बादै बात छन। ये ही भाव का साथ ‘फाग्णै-फिक्वळि’
की रचनाओं तैं पढा़ त इ रचना भि जिकुड़ि म् एक क्याप सि कुतगळि लगै देंदन अर मनखि तैं गाण्यूं की गदन्यूं मा झणि कखै-कख बगै देंदन।
असल मा ‘फाग्णै- फिक्वळि’ सरल शब्दों मा सहज भावों की अभिव्यक्ति छ जैमा कवि एक नौनी- ‘माघु’ तैं माध्यम बणैकि अपणा मयळ्दू मन की कुंगळि गाण्यूं तैं शब्दों की माळा मा गंठ्यांणू छ
अर एक कहानी द्वारा अपणि बात तैं ऐथर बढ़ाणू छ। जनकि पैली ‘माघु’ कु जन्म (माघु की पैली परभात’) फिर ‘माघु’ को बाळोपन (‘माघु लगाणि ग्वे’, ‘ऐगिं माघु का द्वी दांत’, ‘माघु इस्कोल जण्या ह्वेगि’)
अर फिर ‘माघु’ को यौवन ( ‘माघु फागुण्या बसंत हुईं चा’, ‘अब त करा भै मंगणि’) अर आखिर मा जो ऐ छ वो गै भि छ- ‘माघु’ भि चलिगे ‘फागु’ से दूर अर तबि त ‘फागु’ फिक्वाळ ह्वेगे, क्यदरा बाटा लगिगे।
‘लाटा ब्योलि-ब्योलकु बणबास’ मा जैकि या कथा थौ ल्हेंद।
‘फाग्णै- फिक्वळि’ मा कवि को भले हि अपणा भावों तैं एक कथा का रूप मा दियूं छ, फिर भी रचनाओं मा विषय की व्यापकता नजर आंद अर आज का समय की समस्या भी द्यखण मा औंदिन्। जनकि :
बल जौंल पैढ़ि- लेखि
सजै- धजै अपणो भ्वाळ
वूंल ही देखा-देखी
छोड़ि कुमाऊँ गढ़वाळ
– ‘फागु फिक्वाळ ह्वेगी’ बटि
यीं पोथी मा मुख्यतः मयळ्दू सुभौ की कुंगळि कविता छन पर फिर भि आज का कतनै समसामयिक विषयों पर यूं रचनाओं मा एक चिंता भि दिखेंद। जनकि बालिका-शिक्षा, बाल-विवाह व बोली-भाषा को संरक्षण आदि विषयों पर
कवि अपणी रचनाओं का माध्यम से अपणी बात रखद। जनकि:
कैरि स्यूंदि -पाटी
धैरि बुळ्ख्या पाटी
इस्कोले बरदि पैरि
तय्यार ह्वेगी लाटी
– ‘माघु पैली दौं इस्कोल जाणी’ बटि
उत्तराखंड खुणि देवभूमि ब्वले जांद। यख का कण कण मा द्यबतौं को वास मनै जांद। फिर यीं धर्ति मा जळ्म्या मनखि का मन अर मन से उपजीं रचनाओं मा द्यो- द्यबतौं को सुमिरण त हूणू हि छ। जनकि:
द्यप्तौं हूणी जख भक्ति
वखि भै कैलाश चा
पारबति हुईं धरती
नीलकंठ अगास चा
– ‘लाटा ब्योलि-ब्योलकु बणबास’ बटि
साठ का दशक का बाद भाव-प्रधान रचना कम ही दिखेण मा आंदिन अर विचार-प्रधान कविता की तरफ जरा जादा रुझान दिखेंद। इना वातावरण मा ‘फाग्णै- फिक्वळि’ की हृदयस्पर्शी रचनाएं दूदै उमळदि भदळि समिणि
मुलैम नौणी गुंदिकि जन लगदन। जनकि:
हे कन्नि बक्किबात
झट छुटि हूणी गात
त ऐगिं खांद-पींद
माघु का द्वी दांत
– ‘ ऐगिं माघु का द्वी दांत’ बटि
इनि मृमस्पर्शी, कुंगळि गाण्यूं की एक रचना या भि छ कि:
फुर्र फुर्र उडद उडद
घुर्र घुर्र घुरद घुरद
चौकै घिंडुड़ि घुघुति
लाणि छन चौंळ उड़द
– ‘माघु क अन्नप्राशन’ बटि
‘फाग्णै-फिक्वळि’ नौं की यीं पोथी मा रचनाएं जन-जन कहानी का दगड़ अगनै बढ़दन उन- उन भाव-बिम्ब का साथ रस भि बदलदा जंदन। जख बचपन की कविताओं मा वात्सल्य रस की अनुभूति होंद वखि यौवन की कविताओं मा पैलि
श्रृंगार अर फिर वियोग रस दिखेण मा आंद। श्रृंगार रस की कुछ पंक्ति इनि छन:
ये त्यार घुंघर्यळा लट
देखि बादळ बगछट
खुदेणा छन कूल देखि
पंदेर स्यारौं का घट
-‘गंगाजि कु पाणी छै तु’ बटि
वियोग की वेदना की कुछ पंक्ति भि छन जनकि:
दिखेणी नी दुन्या मा
अर औणी सुपन्या मा
त बल फागु धौं माघु
बच्यां मा न मुन्या मा
-‘बच्यां मा न मुन्या मा’ बटि
‘फाग्णै- फिक्वळि’ मा सिर्फ स्वांत सुखाय ना बल्कि सर्वजन हिताय मा भि रचनाकार की रुचि छ। वो पुरणि परम्पराओं का पैतळ्यूं प्रणाम करद त नई सोच तैं सलूट भि मरद।
शैली की दृष्टि से ‘फाग्णै-फिक्वळि’ एक प्रबंध गीतिकाव्य लिखणो प्रयास छ। ये तैं एक प्रयोग भि ब्वले संकेंद किलैकि आजकल जादा मुक्तक हि कविता लिखेणी छन। यीं काव्य-पोथी मा प्रसाद गुण की अधिकता छ अर शब्दशक्ति मा
सामान्यतः लक्षणा को प्रयोग हुयूं छ। भाषा भौत ही सरल छ पर दगड़ मा छुटदा-हर्चदा शब्द भि उकर्यां छन। कलात्मक रुप से कवि शिल्प, शैली, भाषा का मामला अपणा परम्परागत रुपों से संतुष्ट छ अर तुक, छंद, लय यति-गति पर निर्भर छ।
कवि जगमोहन सिंह रावत की पोथी ‘फाग्णै-फिक्वळि’ मा भाव को प्रवाह त सुन्दर छ पर ग्हरै मा अबि जरूर जरा कमि मैसूस होंद। रचनाओं तैं विषय का अनुरूप थ्वडा़ हौरि सुसम्बद्ध अर सुगठित भि करे सकेंद छौ। परन्तु यीं बात से कतै इंकार
नि करे सकेंद कि यीं पोथी ‘फाग्णै-फिक्वळि’ की रचनाएँ पढदरौं तैं एक अलग प्रकारै अनुभूति, एक अलग तराँ को आनन्द जरूर देंदन अर पाठक का मन-मस्तिष्क मा प्रभाव छ्वडण मा सफल छन
किताब: फाग्णै-फिक्वळि’ (गढ़वाळि गीतिकाव्य)
कवि: जगमोहन सिंह रावत
प्रकाशक: रावत डिजिटल, गाजियाबाद
मूल्य: 150/-

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